"राष्ट्र"
पश्चिम में "राष्ट्र" की कल्पना का प्रारंभ में
अविर्भाव किस प्रकार हुआ? सर्वप्रथम, विविध जनसमुदायों ने अपने आपको किसी प्रकार
की प्रादेशिक सीमाओं के अंतर्गत मर्यादित कर लिया. किसी विशिष्ट प्रदेश में रहने
वाले जनों में यह भावना उदय हुयी कि वे उस भूमि के पुत्र है, उसकी अपनी एक जीवन
पद्धति है, जिसको उन्हें सुरक्षित रखना है तथा उनके स्वार्थ इसी प्रकार भिन्न हैं,
संक्षेप में उनका एक अलग अस्तित्व है. इस प्रकार वे एक सुगठित एवं अविभाज्य समुदाय
बन गए. समय-समय पर और विभिन्न देशों में विचारवान अग्रणी पुरुषों ने इन समुदायों
का परिचय देने के लिए "राष्ट्र" की भावना को अभिव्यक्त किया है. यदि हम
उनके द्वारा की गयी अनेक अभिव्यक्तियाँ एवं परिभाषाएं संकलित करके उनका सार
निकालें तो हमे कुछ निश्चित एवं सरल निष्कर्ष प्राप्त होते हैं.
राष्ट्र की कसौटी- किसी राष्ट्र के लिए प्रथम अपरिहार्य
वस्तु एक भूखण्ड है जो यथासंभव किन्ही प्राकृतिक सीमाओं से आबद्ध हो तथा एक
राष्ट्र के रहने और बुद्धि एवं समृद्धि के लिए आधार रूप में काम दे. द्वितीय
आवश्यकता है उस विशिष्ट भू-प्रदेश में रहने वाला समाज जो उसके प्रति मातृभूमि के
रूप में प्रेम एवं पूज्य भाव विकसित करता है तथा अपने पोषण, सुरक्षा और समृद्धि के
स्थान के रूप में उसे ग्रहण करता है. संक्षेप में, वह समाज उस भूमि के पुत्र रूप
में स्वयं को अनुभव करे.
वह समाज केवल मनुष्यों का एक समुच्चय ही नहीं होना चाहिए. विजातीय
व्यक्तियों का किसी स्थान पर एकत्रीकरण मात्र नहीं चाहिए, जिसको जीवन के आदर्श,
संस्कृति, अनुभूतियों, भावनाओं, विश्वास एवं परम्पराओं के सम्मिलन के द्वारा एक
स्वरुप दिया गया हो. इस प्रकार जब समाज सामान परम्पराओं एवं महत्वाकांक्षाओं से
युक्त, अतीत जीवन की सुख-दुःख की समान स्मृतियों और शत्रु-मित्र की सामान
अनुभूतियों वाला तथा जिनके सभी हित संग्रहित होकर एक रूप हो गए हैं, इस
सुव्यवस्थित रूप में संगठित हो जाता है, तब इस प्रकार के लोग उस विशिष्ट प्रदेश
में पुत्र के रूप में निवास करते हुए एक राष्ट्र कहे जाते है.
सांस्कृतिक सहचारिता- हमारी एक जीवन धारा है, जिसे हम
संस्कृति कहते हैं, जो अति उद्दात गुण, पवित्रता, चारित्र्य, धैर्य एवं आत्मबलिदान
की भावना को व्यक्ति व्यक्ति के ह्रदय में निविष्ट कराती हुई उसे मानव सत्ता के
उच्चतम लक्ष्य को प्राप्त करने की योग्यता प्रदान करती है. किसी विशिस्ट प्रदेश
में साधारण रूप से निवास मात्र समान चारित्र्य एवं गुणों से संपन्न एकात्म,
राष्ट्रीय समाज का निर्माण नहीं कर सकता. नवगातों को अपने जीवन के दृष्टिकोण में
आमूल परिवर्तन लाना चाहिए की मानो प्राचीन राष्ट्रीय कुल परंपरा में उसका
पुनर्जन्म हुआ हो.
राष्ट्रीयता की कसौटी- व्यक्ति का जन्मा जिस भूमि पर हुआ
है, क्या वह उस मिट्टी का ऋणी है? क्या वह, उस देश के प्रति जहाँ उसका पालन-पोषण
हुआ है, कृतज्ञ है? क्या वह अनुभव करता है कि वह उस देश और उसकी परम्पराओं की
संतति हैं और उसकी सेवा करना उसके भाग्य की धान्यता है? किसी व्यक्ति को किसी देश
में जन्म तथा पालन-पोषण होने मात्र से ही उस भू-भाग के राष्ट्रीय होने का अधिकार
नहीं मिल जाता. इसके लिए उसमे तदनुरूप मानसिक प्रतिमान की भी आवश्यकता होती है.
राष्ट्रीयता के लिए मानसिक निष्ठा एक ऐसा तत्त्व है, जिसे सम्पूर्ण संसार स्वीकार
करता है.
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